*मुक्त-मुक्तक : 331 - या रब कभी-कभार..............


या रब कभी-कभार तो 
मनचाही चीज़ दे ॥
थोड़ा ही दे खाने को 
वलेकिन लज़ीज़ दे ॥
आती है शर्म उघड़े बदन 
भीड़-भाड़ में ,
दो चड्डियाँ , दो पेण्ट , 
दो कुर्ते-कमीज़ दे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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