*मुक्त-मुक्तक : 353 - मेरे ग़रीबख़ाने पे.....................


मेरे ग़रीबख़ाने पे 
दीवाने ख़ास में ॥
बिलकुल दुरुस्त-चुस्त 
होशो-हवास में ॥
क्या हो गया जो मिलते थे
बुर्क़े में दूर से ,
पास आ रहे हैं आज 
कम से कम लिबास में ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

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