*मुक्त-मुक्तक : 351 - आस-विश्वास......................


आस-विश्वास मारे जा रहे हैं ॥
आम-ओ-ख़ास मारे जा रहे हैं ॥
पहले ख़ुशबू ही देते थे मगर अब ,
फूल सब बास मारे जा रहे हैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक आज शनिवार (28-09-2013) को ""इस दिल में तुम्हारी यादें.." (चर्चा मंचःअंक-1382)
पर भी होगा!
हिन्दी पखवाड़े की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
बहुत सुन्दर।

आस-विश्वास मारे जा रहे हैं ॥
आम-ओ-ख़ास मारे जा रहे हैं ॥
पहले देते थे बस सुगंध पर अब ,
फूल सब बास मारे जा रहे हैं ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

वो देखो शान से जूते खाते जा रहें हैं ,

"बात तो करेंगे फिर भी "कहे जा रहें हैं ,

उनके समर्थक हांके जा रहें हैं ,

जूता खाया है तो सोच समझके ही खाया होगा ,



धन्यवाद ! राजीव कुमार झा जी !
धन्यवाद ! रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी !
धन्यवाद ! कालीपद प्रसाद जी !
धन्यवाद ! Virendra Kumar Sharma जी !

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