*मुक्त-मुक्तक : 345 - रेग्ज़ारों की बियाबाँ.................


रेग्ज़ारों की बियाबाँ की 
हर डगर घूमा ॥
तन्हा-तन्हा,गली-गली,
शहर-शहर घूमा ॥
मेरी तक़्दीर कि तक़्दीर में 
जो था ही नहीं ,
जुस्तजू में मैं 
उसी की ही उम्र भर घूमा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक कल सोमवार (23-09-2013) को "वो बुलबुलें कहाँ वो तराने किधर गए.." (चर्चा मंचःअंक-1377) पर भी होगा!
हिन्दी पखवाड़े की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
बहुत बहुत धन्यवाद ! रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी !

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