*मुक्त-मुक्तक : 342 - बेबस हो वो ख़रीदे..................


बेबस हो वो ख़रीदे 
मुँहमाँगे दाम में ॥
जो चीज़ रोज़ आती 
इंसाँ के काम में ॥
गोदाम में कर सूरज को 
क़ैद बेचें वो ,
एक-एक किरन इक-इक 
सूरज के दाम में ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Ghanshyam kumar said…
बहुत सुन्दर...
'एक-एक किरन इक-इक सूरज के दाम में...'

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

मुक्त ग़ज़ल : 267 - तोप से बंदूक