*मुक्त-मुक्तक : 340 - पुरग़ज़ब सादा..................


पुरग़ज़ब सादा हर इक 
उनका लिबास ॥
देखने में भी नहीं वो 
ख़ूब-ओ-ख़ास ॥
फ़िर भी जाने कैसी है 
उनमें कशिश ?
मैं चला जाता हूँ खिंचता 
उनके पास ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

मुक्त ग़ज़ल : 267 - तोप से बंदूक