*मुक्त-मुक्तक : 339 - बिना गुनाह के.................

बिना गुनाह के 
सज़ा ही मिल गई यारों ॥
यूँ समझो जीते जी 
क़ज़ा ही मिल गई यारों ॥
किया है जिसने दिलो-
जाँ से इश्क़ तो लेकिन ,
वस्ल की जा जिसे 
जुदाई मिल गई यारों ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 


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