*मुक्त-मुक्तक : 338 - बर्बाद मेरी हस्ती...................


बर्बाद मेरी हस्ती को 
सँवार दिया था ॥
यों डूबती कश्ती को 
पार उतार दिया था ॥
मुझ जैसे गिरे क़ाबिले-
नफ़रत को उठा जब ,
मजनूँ को जैसे लैला 
वाला प्यार दिया था ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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