*मुक्त-मुक्तक : 336 - लगता खुली किताब...................


लगता खुली किताब है जो 
एक राज़ वो ॥
दिखने में सीधा-सादा बड़ा 
चालबाज़ वो ॥
कर-कर के बातें सिर्फ़ 
वफ़ा आश्नाई की ,
देता है दग़ा दिल पे गिराता है 
गाज़ वो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

vinay sahu said…
G.P.Sahu ki or se Naye saal ki bahut sari shuvh kamanaye mubarak ho
(Abhi se aur isi samay se -2014)
Aapke ye sare shair achche lahe
आपका बहुत धन्यवाद ! GP Sahu जी और vinay sahu जी ! आपको भी बहुत बहुत मुबारकबाद स्वीकार हो ।

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