*मुक्त-मुक्तक : 333 - तोड़ डालूँ या................


तोड़ डालूँ या स्वयं ही टूट लूँ ?
सौंप दूँ सब कुछ या पूरा लूट लूँ ?
सुनहरा अवसर है प्रहरी सुप्त हैं , 
क्यों न कारागृह को फाँदूँ छूट लूँ ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Sriram Roy said…
हीरालालजी आपकी लेखनी को मेरा नमन
बहुत - बहुत धन्यवाद ! Sriram Roy जी !

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