*मुक्त-मुक्तक : 332 - अंतरतम की पीड़............


अंतरतम की पीड़ घनी 
हो होकर हर्ष बनी ॥
जीवन की लघु सरल क्रिया 
गुरुतर संघर्ष बनी ॥
तीव्र कटुक अनुभव की भट्टी में 
तप कर निखरा ,
मेरी आत्महीनता ही 
मेरा उत्कर्ष बनी ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Pratibha Verma said…
बहुत सुन्दर प्रस्तुति। ।

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