*मुक्त-मुक्तक : 328 - कभी कभार ही पीड़ा.............


कभी-कभार ही पीड़ा-दुःख को 
हर्ष अतिरेक कहा हो ॥
वज्र मूढ़ता को चतुराई-
बुद्धि-विवेक कहा हो ॥
उलटबाँसियाँ कहना यद्यपि 
रुचिकर नहीं मुझे ,
तदपि विवशतावश ही कदाचित 
इक को अनेक कहा हो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

anand murthy said…
bahut khoob sriman......

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