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Thursday, September 5, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 326 - शिक्षा के मंदिर थे..............


शिक्षा के मंदिर थे जो 
आलय भी नहीं रहे ॥
शिक्षक पूर्वकाल से 
गरिमामय भी नहीं रहे ॥
दोहा गुरु-गोविंद खड़े दोऊ..... 
का व्यर्थ हुआ ,
शिक्षक के विद्यार्थियों में 
भय भी नहीं रहे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

4 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
--
गुरूजनों को नमन करते हुए..शिक्षक दिवस की शुभकामनाएँ।
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शुक्रवार (06-09-2013) के सुबह सुबह तुम जागती हो: चर्चा मंच 1361 ....शुक्रवारीय अंक.... में मयंक का कोना पर भी होगी!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Darshan jangra said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!


कृपया आप यहाँ भी पधारें और अपने विचार रखे धर्म गुरुओं का अधर्म की ओर कदम ..... - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः13

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी ! मेरी रचना को अपने मंच पर स्थान देने का !

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! Darshan jangra जी !