*मुक्त-मुक्तक : 325 - सदा जले थे..................


सदा जले थे जिसकी उत्कट 
भूख पिपासा में ॥
जिसे किया था प्रेम प्यार की 
ही प्रत्याशा में ॥
नहीं मिला साँसे देकर भी 
जिसका अंतर्तम ,
रहे अंत तक हाय उसी की 
ही अभिलाषा में ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Suresh Rai said…
वो धुंडते रहे शब्द का अर्थ प्रेम की परिभाषा मे
मैने जो खोल दी दिल की किताब जिज्ञासा मे

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