105 : मुक्त-ग़ज़ल - चाहत के मुताबिक़ कुछ...............

चाहत के कुछ मुताबिक़  करने नहीं देता वो ॥
जीता हूँ इसलिए कि मरने नहीं देता वो ॥
मैं आस्माँ के ऊपर तालिब हूँ देखने का ,
मेरी झुकी नज़र को उठने नहीं देता वो ॥
आज़ाद हूँ मैं जैसा जी चाहे झूठ बोलूँ ,
सच्चाई गाह खुलकर कहने नहीं देता वो ॥
जब तक खड़े हैं चलने को मारता है कोड़े ,
चलने लगो तो आगे बढ़ने नहीं देता वो ॥
करता है यों हुकूमत अपने सिवा किसी को ,
टुक बादशाह भरसक बनने नहीं देता वो ॥
मुमकिन न रह गया है अब उसके साथ रहना ,
देता है दम-ब-दम ग़म हँसने नहीं देता वो ॥
मरहम नहीं लगाता उल्टे कुरेदता है ,
हर हाल ज़ख्म मेरे भरने नहीं देता वो ॥
हरगिज़ नहीं हूँ यारों मैं बाँझ पेड़ लेकिन ,
गुंचों को नोचकर के फलने नहीं देता वो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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