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Sunday, September 1, 2013

104 : मुक्त-ग़ज़ल - कुछ ख़तावार कुछ.................


कुछ ख़तावार कुछ गुनाहगार होना था ॥
साफ़ होने को कुछ तो दाग़दार होना था ॥
जैसा मुमताज़ का है आगरे में ताजमहल ,
सरफ़रोशों का भी ऐसा मज़ार होना था ॥
उनको होना था सियासत में कामयाब अगर ,
खोल में गाय के लोमड़-सियार होना था ॥
चंद रुपयों में उनको कौन देता सब्ज़ी-फल ?
हाथ में पौंड या डॉलर का बार होना था ॥
तुम ही बतलाओ कैसे उनपे हम बरस पड़ते ?
कुछ तो उनके लिए दिल में गुबार होना था ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

6 comments:

Darshan jangra said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - सोमवार -02/09/2013 को
मैंने तो अपनी भाषा को प्यार किया है - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः11 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra




डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! Darshan jangra जी ! मेरी रचना को चर्चा में शामिल करने का !

Sriram Roy said...

आपको बहुत -बहुत बधाई इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए। …. कभी मेरी रचनाएँ भी देखें। …।

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! अवश्य अवश्य Sriram Roy जी !

राजीव कुमार झा said...

बहुत सुन्दर कविता .
http://dehatrkj.blogspot.com

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! राजीव कुमार झा जी !