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Showing posts from September, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 353 - मेरे ग़रीबख़ाने पे.....................

मेरे ग़रीबख़ाने पे 
दीवाने ख़ास में ॥ बिलकुल दुरुस्त-चुस्त 
होशो-हवास में ॥ क्या हो गया जो मिलते थे
बुर्क़े में दूर से , पास आ रहे हैं आज 
कम से कम लिबास में ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 352 - कैसा पागल.....................

कैसा पागल बादल है 
कहता है प्यासा हूँ ? क्यों लबरेज़ समंदर बोले 
खाली कासा हूँ ? किसके खौफ़ से आज बंद हैं 
मुँह बड़बोलों के ? भारी भरकम टन ख़ुद को 
कहता है माशा हूँ ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 351 - आस-विश्वास......................

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आस-विश्वास मारे जा रहे हैं ॥ आम-ओ-ख़ास मारे जा रहे हैं ॥ पहले ख़ुशबू ही देते थे मगर अब , फूल सब बास मारे जा रहे हैं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 350 - वो जबसे ही कुछ...................

वो जबसे ही कुछ दूर 
जाने लगे ॥ ख़यालों में तबसे ही 
छाने लगे ॥ नहीं लगते थे कल 
तलक अच्छे अब , वही सबसे ज़्यादा 
लुभाने लगे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 349 - सख़्त ख़ल्वत में........................

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सख़्त ख़ल्वत में भयानक जले -कटे जैसी ॥ चील सी गिद्ध सी बाज और गरुड़ के जैसी ॥ जबसे महबूब उठा पहलू से मेरे तबसे , मैं हूँ नागिन तो रात मुझको नेवले जैसी ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 348 - जिसका जैसा नसीब..................

जिसका 
जैसा नसीब होता है ॥ उसको 
वैसा नसीब होता है ॥ मुफ़लिसी गर 
लिखी हो क़िस्मत में , किसको 
पैसा नसीब होता है ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 347 - प्यार के चक्कर में.....................

प्यार के चक्कर में 
बेघरबार होकर ख़ुश रहूँ ॥ मैं हूँ पागल इश्क़ की 
बीमार होकर ख़ुश रहूँ ॥ बज़्म,मजलिस,अंजुमन,
पुरशोर-महफ़िल से जुदा , बेज़ुबाँ वीराँ में गुमसुम 
नार होकर ख़ुश रहूँ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 346 - यूँ ही शेरों से.....................

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यूँ ही शेरों से नहीं कोई उलझ पड़ता है ? जिसमें होता है दम-ओ-गुर्दा वही लड़ता है ॥ बज़्म-ए-रावण में कोई लँगड़ा पहुँच जाये मगर , पाँव अंगद की तरह कौन जमा अड़ता है ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 345 - रेग्ज़ारों की बियाबाँ.................

रेग्ज़ारों की बियाबाँ की 
हर डगर घूमा ॥ तन्हा-तन्हा,गली-गली,
शहर-शहर घूमा ॥ मेरी तक़्दीर कि तक़्दीर में 
जो था ही नहीं , जुस्तजू में मैं 
उसी की ही उम्र भर घूमा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 344 - लगती है थोड़ी..............

लगती है थोड़ी देर मगर 
फ़िक्र तू न कर ॥ खाली न जाएगी मेरी 
दुआ-ए-पुरअसर ॥ तू जिसको माँगता है 
तू क़ाबिल भी उसके है , बेशक़ तू हक़ को पाएगा 
यकीन कर उस पर ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 343 - न ख़्वाबों में...............

न ख़्वाबों में हक़ीक़त में 
मुलाकातें करेंगे पर...... मेरे सँग दिन-दुपहरी-शाम 
और रातें करेंगे पर....... किया करते थे जैसे रूठने से
पहले बढ़-बढ़ कर , मुझे लगता था वो इक रोज़ 
ख़ुद बातें करेंगे पर....... -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 342 - बेबस हो वो ख़रीदे..................

बेबस हो वो ख़रीदे 
मुँहमाँगे दाम में ॥ जो चीज़ रोज़ आती 
इंसाँ के काम में ॥ गोदाम में कर सूरज को 
क़ैद बेचें वो , एक-एक किरन इक-इक 
सूरज के दाम में ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 341 - वस्ल की जितना हो...................

वस्ल की जितना हो उम्मीद 
कमजकम रखना ॥ हिज्र के बाद भी हँसने का 
दिल में दम रखना ॥ वरना मत भूलकर भी 
राहे इश्क़ में अपनी , आँखें दौड़ाना-बिछाना-
लगाना-नम रखना ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 340 - पुरग़ज़ब सादा..................

पुरग़ज़ब सादा हर इक 
उनका लिबास ॥ देखने में भी नहीं वो 
ख़ूब-ओ-ख़ास ॥ फ़िर भी जाने कैसी है 
उनमें कशिश ? मैं चला जाता हूँ खिंचता 
उनके पास ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 339 - बिना गुनाह के.................

बिना गुनाह के 
सज़ा ही मिल गई यारों ॥ यूँ समझो जीते जी 
क़ज़ा ही मिल गई यारों ॥ किया है जिसने दिलो-
जाँ से इश्क़ तो लेकिन , वस्ल की जा जिसे 
जुदाई मिल गई यारों ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 338 - बर्बाद मेरी हस्ती...................

बर्बाद मेरी हस्ती को 
सँवार दिया था ॥ यों डूबती कश्ती को 
पार उतार दिया था ॥ मुझ जैसे गिरे क़ाबिले-
नफ़रत को उठा जब , मजनूँ को जैसे लैला 
वाला प्यार दिया था ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 337 - क्या सितम-ज़ुल्म-जफ़ा................

क्या सितम-ज़ुल्म-
जफ़ा करना बुरी बात नहीं ? क्या मोहब्बत में 
दग़ा करना बुरी बात नहीं ? तो जो ऐसा हो 
सितमगर-ओ-दग़ाबाज़ उससे , अपना वादा-ओ-
वफ़ा करना बुरी बात नहीं ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 336 - लगता खुली किताब...................

लगता खुली किताब है जो 
एक राज़ वो ॥ दिखने में सीधा-सादा बड़ा 
चालबाज़ वो ॥ कर-कर के बातें सिर्फ़ 
वफ़ा आश्नाई की , देता है दग़ा दिल पे गिराता है 
गाज़ वो ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 335 - रोजी-रोटी न...................

रोजी-रोटी न काम-
धाम की पर्वाह तू कर ॥ फिर न रुसवाई की न 
नाम की पर्वाह तू कर ॥ अपने पाँवों को पर 
बनाने की बस फ़िक्र को रख , इश्क़ कीजै तो मत 
मक़ाम की पर्वाह तू कर ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 334 - इक नहीं खोटा.................

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इक नहीं खोटा सभी चोखे दिये हैं ॥ सब ने मिल-जुल कर जो कुछ धोखे दिये हैं ॥ आस्तीनों में जो पाले साँप थे तो , मैंने ही डसने के ख़ुद मौक़े दिये हैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 333 - तोड़ डालूँ या................

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तोड़ डालूँ या स्वयं ही टूट लूँ ? सौंप दूँ सब कुछ या पूरा लूट लूँ ? सुनहरा अवसर है प्रहरी सुप्त हैं , क्यों न कारागृह को फाँदूँ छूट लूँ ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 332 - अंतरतम की पीड़............

अंतरतम की पीड़ घनी 
हो होकर हर्ष बनी ॥ जीवन की लघु सरल क्रिया 
गुरुतर संघर्ष बनी ॥ तीव्र कटुक अनुभव की भट्टी में 
तप कर निखरा , मेरी आत्महीनता ही 
मेरा उत्कर्ष बनी ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 331 - या रब कभी-कभार..............

या रब कभी-कभार तो 
मनचाही चीज़ दे ॥ थोड़ा ही दे खाने को 
वलेकिन लज़ीज़ दे ॥ आती है शर्म उघड़े बदन 
भीड़-भाड़ में , दो चड्डियाँ , दो पेण्ट ,
दो कुर्ते-कमीज़ दे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 330 - कैसे टूटेगा कोई..............

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कैसे टूटेगा कोई हाथ पाँव या सर ? गोटमार मेले में यदि चले नहीं पत्थर ॥ तर्कहीन और खोखले छोड़ो रीति-रिवाज़ , अपनाओ बस लाभ की परम्पराएँ हर ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 329 - भोजन का भूख................

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भोजन का भूख में भी जो उपयोग न हुआ ॥ क्या लाभ कि उपलब्धि का उपभोग न हुआ ॥ लादे फिरे ज्यों पीठ पुस्तकों की बोरियाँ , फिर भी रहे गधा गधा ही लोग न हुआ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 328 - कभी कभार ही पीड़ा.............

कभी-कभार ही पीड़ा-दुःख को 
हर्ष अतिरेक कहा हो ॥ वज्र मूढ़ता को चतुराई-
बुद्धि-विवेक कहा हो ॥ उलटबाँसियाँ कहना यद्यपि 
रुचिकर नहीं मुझे , तदपि विवशतावश ही कदाचित 
इक को अनेक कहा हो ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 327 - ऐसा नहीं कि उससे...............

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ऐसा नहीं कि उससे मेरा ग़म था कहीं कम ॥ मैं नाचता था वो मनाता रहता था मातम ॥ तक्लीफ़ में ख़ुश रहने का फ़न मुझको था पता , वो लुत्फ़ो-मज़ा में भी ढूँढ लेता था इक ग़म ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 326 - शिक्षा के मंदिर थे..............

शिक्षा के मंदिर थे जो 
आलय भी नहीं रहे ॥ शिक्षक पूर्वकाल से 
गरिमामय भी नहीं रहे ॥ दोहा गुरु-गोविंद खड़े दोऊ.....
का व्यर्थ हुआ , शिक्षक के विद्यार्थियों में 
भय भी नहीं रहे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 325 - सदा जले थे..................

सदा जले थे जिसकी उत्कट 
भूख पिपासा में ॥ जिसे किया था प्रेम प्यार की 
ही प्रत्याशा में ॥ नहीं मिला साँसे देकर भी 
जिसका अंतर्तम , रहे अंत तक हाय उसी की 
ही अभिलाषा में ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

105 : मुक्त-ग़ज़ल - चाहत के मुताबिक़ कुछ...............

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चाहतके कुछ मुताबिक़  करने नहीं देता वो ॥ जीता हूँ इसलिए कि मरने नहीं देता वो ॥ मैं आस्माँ के ऊपर तालिब हूँ देखने का , मेरी झुकी नज़र को उठने नहीं देता वो ॥ आज़ाद हूँ मैं जैसा जी चाहे झूठ बोलूँ , सच्चाई गाह खुलकर कहने नहीं देता वो ॥ जब तक खड़े हैं चलने को मारता है कोड़े , चलने लगो तो आगे बढ़ने नहीं देता वो ॥ करता है यों हुकूमत अपने सिवा किसी को , टुक बादशाह भरसक बनने नहीं देता वो ॥ मुमकिन न रह गया है अब उसके साथ रहना , देता है दम-ब-दम ग़म हँसने नहीं देता वो ॥ मरहम नहीं लगाता उल्टे कुरेदता है , हर हाल ज़ख्म मेरे भरने नहीं देता वो ॥ हरगिज़ नहीं हूँ यारों मैं बाँझ पेड़ लेकिन , गुंचों को नोचकर के फलने नहीं देता वो ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति