98 : मुक्त-ग़ज़ल - अपनी कविताओं में........


अपनी कविताओं में मैं अपनी व्यथा कहता रहा ॥
लोग मेरे सच को समझे मैं कथा कहता रहा ॥
मैं न चिंघाड़ा - दहाड़ा तब तलक हर मेमना ,
मुझको इक कुत्ता-सूअर-बक़रा-गधा कहता रहा ॥
हर जतन जिसने किया मुझको डुबोने का मैं उस
दोस्त को फिर फिर उबरकर नाख़ुदा कहता रहा ॥
जब तलक दुनिया है क्या मुझको समझ आई नहीं ,
अच्छे को अच्छा बुरे को मैं बुरा कहता रहा ॥
ख़ुदकुशी करने से क्या रोका उसे , ताज़िन्दगी
मेरे इस अहसां को उल्टा वो ख़ता कहता रहा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

धन्यवाद ! Pratibha Verma जी !
Rudra Kourav said…
accha likhto ho sir
Ghanshyam kumar said…
बहुत सुन्दर...!!
'ख़ुदकुशी करने से क्या रोका उसे, ताज़िन्दगी
मेरे इस अहसां को उल्टा वो ख़ता कहता रहा॥'
धन्यवाद ! Ghanshyam kumar जी !
धन्यवाद ! Yoginder Singh जी !

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