*मुक्त-मुक्तक : 324 - गुमनाम को शोहरत..............

गुमनाम को शोहरत का ख़ुदा आस्मान बख़्श ॥
फ़नकार हूँ नाचीज़ हूँ कुछ मुझको शान बख़्श ॥
मुफ़लिस हूँ नहीं चलती इस हुनर से ज़िंदगी ,
मेरी मुर्दा ज़िंदगी को न काँधा दे जान बख़्श ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 


Unknown said…
भीड़ से जुदा तो कोई पहचान बख़्स.
Anonymous said…
When I initially commented I clicked the "Notify me when new comments are added" checkbox and now each time a comment is
added I get several emails with the same comment.
Is there any way you can remove me from that service?
Bless you!

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