*मुक्त-मुक्तक : 323 - मैं मुरीद वीरानों का..............


मैं मुरीद वीरानों का 
सचमुच अलबेला हूँ ॥
बाहर दिखता भीड़भाड़ हूँ 
झुण्ड हूँ मेला हूँ ॥
महफ़िल में शिरकत तो 
रस्मन करनी पड़ती है ,
अंदर तन्हा ,एकाकी धुर ,
निपट अकेला हूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

shishirkumar said…
'Andar tanha ekaki dhur nipat Akela hoon' -- Bas yah line jhakjhorne ke liye kafee hai.
Dhanyabad Dr sahab!
बहुत बहुत धन्यवाद ! shishirkumar जी !

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