*मुक्त-मुक्तक : 318 - न परायों से न..................


न परायों से न अपनों से 
न ख़ुद से डरना ॥
जब भी इस राह पे पाँव 
अपने उठाकर धरना ॥
जब ख़ुदा ही है जब है रब तो 
डर के छुप के क्यों ,
इश्क़ बाक़ायदा 
कर कर के मुनादी करना ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शुक्रवार (23-08-2013) को "ईश्वर तू ऐसा क्यों करता है" (शुक्रवारीय चर्चामंचःअंक-1346) पर भी होगी!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद ! रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी ! मेरी रचना को अपने मंच पर शामिल करने के लिए ।
Pratibha Verma said…
बहुत सुन्दर प्रस्तुति। ।
धन्यवाद ! Pratibha Verma जी !

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