*मुक्त-मुक्तक : 316 - बर्फ़ानी काली-रात...............


बर्फ़ानी काली-रात 
दुपहरी का आफ़्ताब ॥
घनघोर अमावस में 
ऊग जाये माहताब ॥
दीवाने का हर्फ़-हर्फ़ 
लफ़्ज़-लफ़्ज़ सही हो ,
चेहरे से इक ज़रा सा तू 
उठा दे गर नक़ाब ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Pratibha Verma said…
बहुत सुन्दर प्रस्तुति। ।
धन्यवाद ! Pratibha Verma जी !

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