*मुक्त-मुक्तक : 312 - जिससे ऊबा हूँ............



जिससे ऊबा हूँ रोज़-रोज़ मशक़ में आया ॥
जिसको चखते ही उल्टियाँ हों हलक़ में आया ॥
कैसे बोलूँ ये दस्तयाबी क़ामयाबी है ?
जिससे बचता था दूर रहता था हक़ में आया ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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