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Saturday, August 17, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 311 - आँखों के बाद भी..............


आँखों के बाद भी रहे 
मंजर से दूर हम ॥
अल्लाह-ख़ुदा-रब-वली-
ईश्वर से दूर हम ॥
किस बात का  था ग़ुस्सा कि 
हम मुँह  बिसूर के ,
होटल में रहे ग़ैर के निज 
घर से दूर हम ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

6 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक कल रविवार (18-08-2013) को "नाग ने आदमी को डसा" (रविवासरीय चर्चा-अंकः1341) पर भी होगा!
स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

बहुत बहुत धन्यवाद ! रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी ! मेरी रचना को अपने मंच पर लेने के लिए ।

mahesh soni said...

वाह बहुत ही शानदार सुंदर प्रस्तुति..मित्र डॉ. हीरालाल जी

sharad said...

बेवज़ह
तकनीक क्यूँ है
प्यार
में
तकलीफ़ क्यूँ है !
गुलगुले
परहेज़ में हैं
गुड़
तलक़ ही
नीक क्यूँ है !!
- शरद जायसवाल कटनी म.प्र. इंडिया
मो. 9893417522

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

बहुत बहुत धन्यवाद ! mahesh soni जी !

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

वाह ! धन्यवाद ! sharad जी !