*मुक्त-मुक्तक : 310 - मेरे जितने हमसफर.............


मेरे जितने हमसफ़र थे तयशुदा मंजिल पे हैं ॥
मैं तलातुम में हूँ बाक़ी ख़ुशनुमा साहिल पे हैं ॥
मैं भी उतना ही था मेहनतकश औ’’ ताक़तवर मगर ,
मैं पड़ा पाताल सारे माह-ए-क़ामिल पे हैं ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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