*मुक्त-मुक्तक : 309 - मुफ़लिसी में अपार................


मुफ़लिसी में अपार 
दौलतो-दफ़ीना हो ॥
बाढ़ से जो लगा दे 
पार वो सफ़ीना हो ॥
धुप्प अँधेरों में इक 
मशालची हो,सूरज हो,
कब से इस बंद दिल का 
तुम धड़कता सीना हो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज शुक्रवार (16-08-2013) को बेईमान काटते हैं चाँदी:चर्चा मंच 1338 ....शुक्रवार... में "मयंक का कोना" पर भी है!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद ! रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी ! मेरी रचना को अपनी चर्चा में शामिल करने के लिए ।

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