*मुक्त-मुक्तक : 303 - बेशक़ ही उसका.................


बेशक़ ही उसका जिस्मे-
पुरकशिश है बेगुनाह ॥
लेकिन है हुस्न कमसिनों के 
दिल की क़त्लगाह ॥
अंधा भी चाहे आँख 
फ़क़त उसके दीद को ,
 जो देखे राह चलता 
रुक के भरता सर्द-आह ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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