*मुक्त-मुक्तक : 302 - न थे हम जिनके..........


न थे हम जिनके कुछ हमको वो अपना 
सब समझते थे ॥
अज़ीमुश्शान अलग इंसाँ मगर वो 
कब समझते थे ?
क़सम रब की किया करते थे जब
हमसे मोहब्बत वो ,
हमें अपना मजहब-ईमाँ क्या अपना 
रब समझते थे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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