*मुक्त-मुक्तक : 299 - न ग़म होता.........


न ग़म होता तो क़ीमत 
कुछ नहीं होती मसर्रत की ॥
अगर होती न नफ़रत 
क्या वकअत होती मोहब्बत की ॥
मयस्सर होता सब सामाँ 
जो आसानी से ख़्वाबों का ,
ज़रूरत फिर तो रब की भी 
न रह जाती इबादत की ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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