मुक्तक : 297 - क्या ग़ज़ब की.............


क्या ग़ज़ब की उसने 
क़िस्मत पाई है यारों ॥
जुर्म कर कर के भी 
इज्ज़त पाई है यारों ॥
भोगते हैं नर्क हम 
सच्चाई पे चलकर ,
उसने छल-छंदों से 
जन्नत पाई है यारों ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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