103 : मुक्त-ग़ज़ल - हमसे न जाने हुईं..................


हमसे न जाने हुईं क्या गलतियाँ ॥
हर नतीजे पर गिरी हैं बिजलियाँ ॥
हमने नंगे भी निभाया फर्ज़ जब ,
पड़ रही थी कड़कड़ाती सर्दियाँ ॥
हमने घर अपना ही फूँका था मगर ,
हो गईं ख़ुद राख़ जलकर बस्तियाँ ॥
हमने की हैं कोशिशें जी-जान से ,
फिर भी तो हाथों लगीं नाकामियाँ ॥
शौक़ था पीने का लेकिन यों नहीं ,
मंदिरो-मस्जिद में ली हों चुसकियाँ ॥
मुफ़्त दुनिया ने किया रुस्वा हमें ,
कुछ नहीं था मेरे उनके दरमियाँ ॥
हम नहीं होते हैं पास उसमें मगर ,
ज़िंदगी ले इम्तिहाँ पर इम्तिहाँ ॥
जबकि हम बैठे नहीं चलते रहे ,
पर वहीं हैं आज तक कल थे जहाँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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बहुत खूब ... उम्दा
धन्यवाद ! Lekhika 'Pari M Shlok' जी !

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