101 : मुक्त-ग़ज़ल - गर बुरा हूँ.............


गर बुरा हूँ मुझे बुरा कहिए ॥
नोन-मिर्ची लगा-लगा कहिए ॥
जो कहा था वो कर दिखाया है ,
मुझको वादे से मत फिरा कहिए ॥
अपनी तौहीन जो बर्दाश्त करूँ ,
मुझको बेशर्म बेहया कहिए ॥
उनको सर्दी की धूप खूब कहो ,
मुझको मत ओलों की बरखा कहिए ॥
किसको बरबादियों की तोहमत दूँ ,
अपने हाथों न पर मिटा कहिए ॥
अपने रोने को मैं छिपाता हूँ ,
क़हक़हों को छुपी अना कहिए ॥
ज़िंदगी जी रहा हूँ मैं जैसी ,
उसको बखुदा कड़ी सज़ा कहिए ॥
एक मुद्दत से नज़र बंद हूँ मैं ,
कोई पूछे तो मर गया कहिए ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [26.08.2013]
चर्चामंच 1349 पर
कृपया पधार कर अनुग्रहित करें
सादर
सरिता भाटिया
मेरी इस रचना को अपने मंच पर स्थान स्थान देने का बहुत बहुत शुक्रिया सरिता भाटिया जी !
डा. हीरा लाल प्रजपति जी,

बहुत ही सुंदर ,बेहतरीन व मर्मस्पर्शी रचना है,बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएं
बहुत बहुत धन्यवाद ! Mohan Srivastava Poet जी !
धन्यवाद ! रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी !
Kailash Sharma said…
बहुत सुन्दर और मर्मस्पर्शी रचना...

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