100 : मुक्त-ग़ज़ल - जितना भी कमाते.............


जितना भी कमाते हैं सब क़र्ज़ चुकाने को ॥
रक्खे हैं ख़ुद को ज़िंदा बस फ़र्ज़ निभाने को ॥
हम जानते हैं पीना इक हद तलक सही है ,
इस क़दर पी रहे हैं जिगर अपना जलाने को ॥
न जाने कैसा फूँका कि और भड़क उट्ठी ,
वैसे वो सचमुच आए थे आग बुझाने को ॥
मत मान बुरा इसका जो मैं दिल नहीं दिखाता ,
अपनों से भी होते हैं कुछ राज़ छिपाने को ॥
उसके लिए भी थोड़ा सा वक़्त छोड़ रखना ,
सारी उमर पड़ी है खाने को कमाने को ॥
बेदर्द ने इस दिल को ऐसा मरोड़ा तोड़ा ,
क़ाबिल नहीं बचा अब फिर और लगाने को ॥
है मुफ़्त में भी शायद अपनी तो जान महँगी ,
आया न कोई जब हम मरते थे बचाने को ॥
वो मेरा जानी दुश्मन इतना है खूबसूरत ,
जी चाहता है उसको दोस्त अपना बनाने को ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [12.08.2013]
चर्चामंच 1335 पर
कृपया पधार कर अनुग्रहित करें
सादर
सरिता भाटिया
बहुत बहुत धन्यवाद ! सरिता भाटिया जी !
Vaanbhatt said…
चुनिन्दा अशरार...

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

मुक्त-ग़ज़ल : 262 - पागल सरीखा

मुक्त-ग़ज़ल : 264 - पेचोख़म