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Showing posts from August, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 324 - गुमनाम को शोहरत..............

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गुमनाम को शोहरत का ख़ुदा आस्मान बख़्श ॥ फ़नकार हूँ नाचीज़ हूँ कुछ मुझको शान बख़्श ॥ मुफ़लिस हूँ नहीं चलती इस हुनर से ज़िंदगी , मेरी मुर्दा ज़िंदगी को न काँधा दे जान बख़्श ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 323 - मैं मुरीद वीरानों का..............

मैं मुरीद वीरानों का 
सचमुच अलबेला हूँ ॥ बाहर दिखता भीड़भाड़ हूँ 
झुण्ड हूँ मेला हूँ ॥ महफ़िल में शिरकत तो 
रस्मन करनी पड़ती है , अंदर तन्हा ,एकाकी धुर ,
निपट अकेला हूँ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

103 : ग़ज़ल - ग़लतियाँ हमसे हुईं

ग़लतियाँ हमसे हुईं क्या - क्या , कहाँ रे ? सब नतीजों पर गिरींं जो बिजलियाँ रे ।।1।। हमने नंगे रह निभाया फ़र्ज़ तब भी , पड़ रही थींं जब जमाती सर्दियाँ रे ।।2।। घर तो अपना ही था फूँका हमने लेकिन , हो गईं क्यों राख जलकर बस्तियाँ रे।।3।। हमने की थीं कोशिशें जी-जान से ही , जाने क्यों हाथों लगीं नाकामियाँ रे।।4।। शौक़ था पीने का लेकिन यों नहीं था , मंदिरो-मस्जिद में ली हों चुस्कियाँ रे ।।5।। मुफ़्त दुनिया ने किया था हमको रुस्वा , कुछ नहीं था उनके मेरे दरमियाँ रे।।6।। हम नहीं होते हैं उसमें पास फिर भी , ज़िंदगी ले इम्तिहाँ पर इम्तिहाँ रे।।7।। जबकि हम बैठे नहीं चलते रहे हैं , पर वहीं हैं आज तक कल थे जहाँ रे।।8।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

102 : ग़ज़ल - ऐसा नहीं कि हमको

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ऐसा नहीं कि हमको आता नहीं लगाना ।।
पर चूक-चूक जाए  है आज ही निशाना ।।1।।
नादाँँ अगर न होते तो बद को बद न कहते ,
अब किस तरह मनाएँ नाराज़ है ज़माना ?2।।
जब तक न की थी हमने ‘हाँ 'वो मना रहे थे ,
तैयार देख हमको करने लगे बहाना ।।3।।
इतनी दफ़्आ हम उनसे सच जैसा झूठ बोले ,
अंजाम आज का सब सच उसने झूठ माना ।।4।
इक बार आज़माइश हमने न की है उनकी ,
जब जब भी उनको परखा पाया वही पुराना ।।5।।
महफ़िल में अपनी-अपनी कहने में सब लगे हैं ,
सुनने न कोई खाली कहने से क्या फ़साना ?6।।
इस फ़िक्र में कि अपना क्या होगा ज़िंदगी में ,
हम भूल ही चुके हैं क्या हँसना क्या हँसाना ?7।।
कहता  है हिज्र में ही रहता है प्यार ज़िंदा ,
महबूब मुझसे शादी को इसलिए न माना ।।8।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 322 - जिसको थी तमन्ना................

जिसको थी तमन्ना मेरी 
उसको न मिल सका ॥ लेकिन मैं उसके दिल से 
उम्र भर न हिल सका ॥ मैं भी न हँस सका कभी 
रहकर के उससे दूर , वो भी न मेरे हिज्र में 
मुरझा के खिल सका ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 321 - कुछ बस अपने...................

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कुछ बस अपने दीन तो कुछ ईमान बदलते हैं ॥ कुछ तो मालिक कुछ अपने भगवान बदलते हैं ॥ पल में लाल हरे पल भर में अपने मतलब को , अपना रँग गिरगिट जैसा इंसान बदलते हैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

101 : ग़ज़ल - हूँ बुरा तो मुझे

हूँ बुरा तो मुझे बुरा बोलो ।।
ख़ूब मिर्ची-नमक लगा बोलो ।।1।।
जो कहा था वो कर दिखाया है ,
मुझको वादे से मत फिरा बोलो ।।2।।
चुप हो तौहीन जो सहन कर लूँ ,
मुझको बेशर्म-बेहया बोलो ।।3।।
उनको सर्दी की धूप बोलो तो ,
मुझको गर्मी की छाँव सा बोलो ।।4।।
किसको बरबादियों की दूँ तोहमत ,
अपने हाथों न पर मिटा बोलो ।।5।।
गर मैं बोलूँ तो समझो रोता हूँ ,
मेरी चुप्पी को क़हक़हा बोलो ।।6।।
ज़िंदगी जी रहा हूँ मैं जैसी ,
उसको ज़िंदाँ कहो , क़ज़ा बोलो ।।7।।
हूँ नज़रबंद सा मैं मुद्दत से ,
कोई पूछे तो मर गया बोलो ।।8।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 320 - बेबस बक़ैद आस्माँ...................

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बेबस बक़ैद आस्माँ बेकस ज़मीं लगे ॥ औरत उदास ग़मज़दा सा आदमी लगे ॥ बदहाल है आलम तमाम मुल्क़ का यारों , अब ये निज़ाम तो बदलना लाज़मी लगे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 319 - वो कंकड़ी भी मारें............

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वो कंकड़ी भी मारें सर उनके शिला रख दे ॥ इक बुर्ज़ भी छेड़ें तू बुनियाद हिला रख दे ॥ आधी सी भूल पर भी पूरा सबक दे उनको , मत बख़्श दुश्मनों को मिट्टी में मिला रख दे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 318 - न परायों से न..................

न परायों से न अपनों से 
न ख़ुद से डरना ॥ जब भी इस राह पे पाँव 
अपने उठाकर धरना ॥ जब ख़ुदा ही है जब है रब तो 
डर के छुप के क्यों , इश्क़ बाक़ायदा 
कर कर के मुनादी करना ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 317 - सच्चाई-हक़ीक़त..................

सच्चाई-हक़ीक़त से मुँह को 
फेर-मोड़कर ॥ हर फ़र्ज़-ज़िम्मेदारी से 
रिश्ते ही तोड़कर ॥ सालों से लाज़मी थी इक 
तवील नींद सो , आँखें ही मूँद लीं हरेक 
फ़िक्र छोडकर ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

रक्षाबंधन

रक्षाबंधन
सूरत के हिसाब से वह चौदहवीं का चाँद नहीं बल्कि प्रभात का हेमद्रावक सूर्य है रंग उसका स्वर्णिम नहीं प्लेटिनमीय है सर्वांग ढाँप रख सकने में समर्थ ढीले ढाले अपारदर्शी वस्त्र धारण रखने के बावजूद भी जिसकी देहयष्टि के आगे पानी भर रही हों ज़ीरो फ़िगर वाली तमाम फ़िल्मी सेक्स-सिंबल हीरोइने जिन्हे देखकर आदमी खोने लगता है हनीमून के ख्वाबों में और तुम मुझसे कह रहे हो क्योंकि उसका कोई भाई नहीं है क्योंकि मेरी कोई बहन नहीं है बन जाऊँ उसका भाई नहीं मित्र ! कदापि नहीं ! कह दो उसे – रक्षाबंधन के दिन बिना राखी के भी मेरी सूनी कलाई सुंदर लगती है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 316 - बर्फ़ानी काली-रात...............

बर्फ़ानी काली-रात 
दुपहरी का आफ़्ताब ॥ घनघोर अमावस में 
ऊग जाये माहताब ॥ दीवाने का हर्फ़-हर्फ़ 
लफ़्ज़-लफ़्ज़ सही हो, चेहरे से इक ज़रा सा तू 
उठा दे गर नक़ाब ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 315 - नहीं लिखता है तू...............

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नहीं लिखता है तू इक बार लिख मेरी मगर लिखना ॥ ख़ुदा मेरे मेरी तक़दीर दोबारा अगर लिखना ॥ कि जितनी चाय में शक्कर कि आटे में नमक जितना , तू बस उतना ही उसमें रंजो-ग़म कम या ज़बर लिखना ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति  

*मुक्त-मुक्तक : 314 - जाता नहीं मैं...............

जाता नहीं मैं भूलकर भी 
अब तो वहाँ पे ॥ आती है तेरी बेपनाह 
याद जहाँ पे ॥ वीरान दिल को कैसे फिर 
आबाद करूँ मैं ? फिर से बसाऊँ बस्ती 
मोहब्बत की कहाँ पे ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 313 - उनके मुख को मुख................

उनके मुख को मुख नहीं बस 
लिखते रहे कंवल ॥ सिर्फ़ ख़्वाब बुनते रहे बस
 कहते रहे ग़ज़ल ॥ लेने वाला ले उड़ा जब 
उनको पैदल चल , हाथ हिलाते रह गये हम बस
दिल मसल-मसल ॥  -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 312 - जिससे ऊबा हूँ............

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जिससे ऊबा हूँ रोज़-रोज़ मशक़ में आया ॥ जिसको चखते ही उल्टियाँ हों हलक़ में आया ॥ कैसे बोलूँ ये दस्तयाबी क़ामयाबी है ? जिससे बचता था दूर रहता था हक़ में आया ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 311 - आँखों के बाद भी..............

आँखों के बाद भी रहे 
मंजर से दूर हम ॥ अल्लाह-ख़ुदा-रब-वली-
ईश्वर से दूर हम ॥ किस बात का  था ग़ुस्सा कि 
हम मुँह बिसूर के , होटल में रहे ग़ैर के निज 
घर से दूर हम ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 310 - मेरे जितने हमसफर.............

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मेरे जितने हमसफ़र थे तयशुदा मंजिल पे हैं ॥ मैं तलातुम में हूँ बाक़ी ख़ुशनुमा साहिल पे हैं ॥ मैं भी उतना ही था मेहनतकश औ’’ ताक़तवर मगर , मैं पड़ा पाताल सारे माह-ए-क़ामिल पे हैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 309 - मुफ़लिसी में अपार................

मुफ़लिसी में अपार 
दौलतो-दफ़ीना हो ॥ बाढ़ से जो लगा दे 
पार वो सफ़ीना हो ॥ धुप्प अँधेरों में इक 
मशालची हो,सूरज हो, कब से इस बंद दिल का 
तुम धड़कता सीना हो ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

जिस तरह से.................

जिस तरह से पूजो देवी-देवता ,
ठीक यों उनको भी आदृत कीजिये ॥ गीत गाओ रात-दिन स्वातंत्र्य के ,
पर शहीदों को न विस्मृत कीजिये ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

कर गये जो मृत्यु की............

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कर गये जो मृत्यु की गोदी में चिरकालिक शयन ॥ जंगे आज़ादी में जो काम आ गये उनको नमन ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 308 - तक़दीर उड़ाना चाहे..............

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तक़दीर उड़ाना चाहे गर मज़ाक़ दोस्तों ॥ सोना भी हो जाता है पल में ख़ाक दोस्तों ॥ सूरज जला न पाये जिसकी ज़ुल्फ़ उसी की , हो जाएँ हड्डियाँ बरफ़ से राख़ दोस्तों ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 307 - उसको नुकसां नहीं................

उसको नुकसां नहीं है 
सिर्फ़ नफ़ा है मुझसे ॥ इतने सालों में मगर 
पहली दफ़ा है मुझसे ॥ देखके मुझको ख़ुश औ’’
सिर्फ़ ख़ुश होने वाला , मुझको हैरत है आज 
सख़्त ख़फ़ा है मुझसे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 306 - मुझे बर्बाद करने............

मुझे बर्बाद करने में 
न तुम कोई कसर रखना ॥ अगर बच जाऊँ खाने में 
मिलाकर के ज़हर रखना ॥ अगर मिलती हैं इससे ही 
तुम्हें खुशियाँ तो हाज़िर हूँ , मगर मर जाऊँ तो मैयत पे 
दो गुल , दो अगर रखना ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 305 - भावों के मौन.............

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भावों के मौन स्पष्ट प्रहारों से दे जवाब ॥ माना ज़ुबाँ नहीं तो इशारों से दे जवाब । कब तक सहन करेगा बदसलूकियाँ उसकी , अब सब्र छोड़ गोली-कटारों से दे जवाब ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 304 - सुई के रूप में.........

सुई के रूप में घातक 
कटार-खंजर था ॥ वो कोई केंचुआ नहीं 
विशाल अजगर था ॥ सब कुछ अपनी अतल 
तहों में डुबो लेता था , वो गड्ढा ; गड्ढा नहीं था 
महा-समंदर था ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

100 : ग़ज़ल - जितना भी हैं कमाते

जितना भी हैं कमाते ,सब क़र्ज़ को चुकाने ।।
रक्खे हैं ख़ुद को ज़िंदा ,बस फ़र्ज़ ही निभाने ।।1।।
हम जानते हैं पीना ,इक हद तलक सही है ,
पर इस क़दर हैं पीते ,अपना जिगर जलाने ।।2।।
उनने न जाने कैसा ,फूँका भड़क उठी वो ,
वैसे वो आए थे सच ,उस आग को बुझाने ।।3।।
मत मान तू बुरा जो ,मैं दिल नहीं दिखाता ,
अपनों से भी तो पड़ते हैं ,राज़ कुछ छिपाने ।।4।।
उसके लिए भी थोड़ा ,सा वक़्त छोड़ रखना ,
बहुत उम्र अभी पड़ी है ,खाने भी औ' कमाने ।।5।।
बेदर्द ने यूँ दिल को ,कुचला ,मरोड़ा ,तोड़ा ,
क़ाबिल न छोड़ा दोबाराऔर से लगाने ।।6।।
है मुफ़्त में भी शायद ,अपनी तो जान महँगी ,
आया न कोई मरते ,थे जब इसे बचाने ।।7।।
सच ही वो जानी दुश्मन ,इतना है खूबसूरत ,
जी मचले उसको अपना ,तो दोस्त ही बनाने ।।8।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 303 - बेशक़ ही उसका.................

बेशक़ ही उसका जिस्मे-
पुरकशिश है बेगुनाह ॥ लेकिन है हुस्न कमसिनों के 
दिल की क़त्लगाह ॥ अंधा भी चाहे आँख 
फ़क़त उसके दीद को , जो देखे राह चलता 
रुक के भरता सर्द-आह ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति