मुक्तक : 291 - न तिनका है न..............


न तिनका है न कश्ती है 
न इक पतवार अपना है ॥
चलो अब डूब जाने में ही 
बेड़ा पार अपना है ॥
यूँ लाखों से है पहचान औ’’ 
हज़ारों से मुलाक़ातें ,
मगर क्या फ़ाइदा इक भी 
न सच्चा यार अपना है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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