मुक्तक : 289 - ज़माना आ गया कैसा ?




ज़माना आ गया कैसा बुरा ये हाय यार अब ?
हवस के पीछे-पीछे चल पड़ा पाकीज़ा प्यार अब !!
 न ख़्वाहिशमंद कोई रूह का लगता क़सम से ,
सभी दिखते हैं मानो जिस्म के ही तलबगार अब ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

shishirkumar said…
Ab Ishk ki diwangi hogayi Baten purani
Na raha kavira diwana Na rahi meera Diwani.

shishirkumar said…
Ab na rahi ishk ke diwangi ki vo kahani,
Na raha kvira diwana na rahi meera diwani.
सच कहा आपने shishirkumar जी !

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