मुक्तक : 280 - जैसे प्यासे को................


जैसे प्यासे को रेग 
आब नज़र आता है ॥
क़तरा क़तरा भरा 
तालाब नज़र आता है ॥
यूँ ही मेरी नज़र को 
इन दिनों में रातों को ,
जुगनू जुगनू बड़ा 
महताब नज़र आता है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

सुन्दर प्रस्तुति ....!!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार (24-07-2013) को में” “चर्चा मंच-अंकः1316” (गौशाला में लीद) पर भी होगी!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद ! आभार ! रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी !

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