*मुक्त-मुक्तक : 264 - तेरे ख़र्च उठाने..........


तेरे ख़र्च उठाने हर दिन 
बिकता रहा हूँ मैं ॥
तुझको बनाने तू क्या जाने 
मिटता रहा हूँ मैं ॥
तुझको काले काले की 
आवाज़ न दे दुनिया ,
तुझको सूरज सा चमकाने 
घिसता रहा हूँ मैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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