Posts

Showing posts from July, 2013

मुक्तक : 295 - ऊँछती है मेरे.............

ऊँछती है मेरे बालों को 
अपनी पलकों से ॥ झाड़ती है माँ मेरी धूल 
धुली अलकों से ॥ कैसे हो जाऊँ उसकी आँख से 
ओझल उसको , चैन आता है नित्य मेरी 
सतत झलकों से ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

गोदान,ग़बन,निर्मला................

Image
गोदान ,ग़बन ,निर्मला इत्यादि उपन्यास ॥ जितने थे प्रेमचंद के सारे थे बहुत ख़ास ॥ लिक्खीं थीं जितनी भी कहानियाँ कफ़न तलक , आदर्श से यथार्थ के सब ही थीं आस-पास ॥ सब ही थीं आस-पास जो लिक्खा था था क़माल , पढ़ने को उन्हे कितनों ने सीखी थी हिन्दी-भाष ॥   -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 294 - पाँवों के होते.............

Image
पाँवों के होते हाथों से बढ़ना सही नहीं ॥ दुनिया मिटा के जन्नतें गढ़ना सही नहीं ॥ इससे तो ज़मींदोज़ ही रहना मुफ़ीद है , यों छत पे आस्मान की चढ़ना सही नहीं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 293 - जब तक थे..............

जब तक थे तेरे ख़्वाबों 
ख़यालों में खोये से ॥ जागे हुए भी हम थे 
जैसे सोये-सोये से ॥ ठोकर ने तेरी नींद तो 
उड़ा दी मगर हाँ , हँसते हुए भी लगते हैं 
अब रोये-रोये से ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 292 - माना वो 'तू'..............

Image
माना वो तू के भी नहीं लायक़ पर आप बोल ॥ बच्चा है फिर भी उसको अपना माई-बाप बोल ॥ गर्दन दबी है तेरी अभी उसके पाँव में , बेहतर है उसके पाप अभी मत तू पाप बोल ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 291 - न तिनका है न..............

न तिनका है न कश्ती है 
न इक पतवार अपना है ॥ चलो अब डूब जाने में ही 
बेड़ा पार अपना है ॥ यूँ लाखों से है पहचान औ’’
हज़ारों से मुलाक़ातें , मगर क्या फ़ाइदा इक भी 
न सच्चा यार अपना है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 290 - न हाथ मिलाया न.............

न हाथ मिलाया न 
लिपटकर चला गया ॥ यों ही मिले बग़ैर
 पलटकर चला गया ॥ वादा किया था जिसने 
उम्र भर के साथ का , दो दिन में अपनी बात से 
नट कर चला गया ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 289 - ज़माना आ गया कैसा ?

Image
ज़मानाआ गया कैसा बुरा ये हाय यार अब? हवस के पीछे-पीछे चल पड़ा पाकीज़ा प्यार अब !! न ख़्वाहिशमंदकोईरूह का लगता क़सम से , सभी दिखते हैं मानो जिस्म के ही तलबगार अब ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 288 - जहाँ पर हार.............

Image
जहाँ पर हार मिलने पर भी ताज़ा हार मिलता है ॥ हिक़ारत की जगह सच्चा दिलासा प्यार मिलता है ॥ यक़ीनन वो जगह जन्नत नहीं तो और क्या होगी , जहाँ ज़ख़्मी दिलों को मरहम औ’’ तीमार मिलता है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 287 - क्या ख़ूब हिमाक़त..........

क्या ख़ूब 
हिमाक़त की हमने ॥ बेशक़ ही ये 
ज़ुर्रत की हमने ॥ इक तरफ़ा औ’’
उस पर तुर्रा ये , दुश्मन से 
मोहब्बत की हमने ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 286 - बहुत आसानियों..............

बहुतआसानियोंसेकब
वोमुश्किलसेउतरबैठा ख़ुदअपनेपाँवअपनीही
वोमंजिलसेउतरबैठा ख़ुदअपनीही

मुक्तक : 285 - जो गड्ढा है............

Image
जो गड्ढा है वो कुछ करले समंदर बन नहीं सकता ॥ सिपाही चार बित्ते का सिकंदर बन नहीं सकता ॥ उड़े कितनी भी ऊँची बाज से तितली न जीतेगी , बहुत उछले मगर मेंढक तो बंदर बन नहीं सकता ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 284 - आलमे बेवफ़ाई में............

आलमे बेवफ़ाई में 
वफ़ा - वफ़ा लगता ॥ बददुआओं की भीड़ में 
दुआ – दुआ लगता ॥ ऐसा वो हो न हो 
लेकिन हाँ शक्लो-सूरत से , इक नज़र में तो आस्मानी - 
फ़रिश्ता लगता ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 283 - वांछित थे उपन्यास..........

वांछित थे उपन्यास – वृहद 
किन्तु मिलीं गल्प ॥ अत्यंत के भिक्षुक थे पाया 
न्यूनतम - अत्यल्प ॥ ये भाग्य – दोष था कि 
किए यत्न जिस लिए , उसके उचित स्थान पे 
प्रायः मिले विकल्प ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 282 - अभी धोखा नहीं.........

अभी धोखा नहीं खाया 
अभी मातम से खाली है ॥ ग़ज़ल कहना तो है लेकिन 
अभी दिल ग़म से खाली है ॥ खड़ा कर दे जो बहरों के भी 
कानों को वो कहना है , मगर आवाज़ अभी मेरी ये 
उस दमख़म से खाली है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति  

मुक्तक : 281 - दिल में कितनी..........

Image
दिल में कितनी थी तमन्नाएँ सब्ज़ो-लालमगर ॥ रह गईं होते - होते पूरी बाल - बाल मगर ॥ कुछ ख़तावार हम थे कुछ थी हमारी क़िस्मत , चाहते थे उड़ें आज़ाद मिले जाल मगर ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 280 - जैसे प्यासे को................

जैसे प्यासे को रेग 
आब नज़र आता है ॥ क़तरा क़तरा भरा 
तालाब नज़र आता है ॥ यूँ ही मेरी नज़र को 
इन दिनों में रातों को , जुगनू जुगनू बड़ा 
महताब नज़र आता है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 279 - वो मुझसे सरेआम..........

Image
वो मुझसे सरेआम औ अकेले भी मिलती है ॥
पाते ही मेरे दीद मोगरे सी खिलती है ॥ लेकिन मेरे इजहारे मोहब्बत पे जाने क्यों , मौजों में पड़ी डूबती कश्ती सी हिलती है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 278 - राहों में कितनी.................

Image
राहों में कितनी कितनी बार मिल चुका खड़ा ॥ करने को मुझसे ज़िद पे कई मुद्दतों अड़ा ॥ पैवस्त था डर दिल में इतना बेवफ़ाई का , मैं इसलिए इस इश्क़ के पचड़े में न पड़ा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 277- अपने पैरों पर............

Image
अपने पैरों पर ख़ुद अपना ही वज़न उठता नहीं ॥ फिर भी सब ढोते हुए मेरा बदन दुखता नहीं ॥ ज़िंदगी चलना है रुकना मौत है मानूँ हूँ मैं , इसलिए बिन पैर भी मेरा चलन रुकता नहीं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 276 - कुछ नहीं अफ़्सोस........

Image
कुछ नहीं अफ़्सोस गर वो तुच्छ है नाचीज़ है ॥ वो मेरा है मुझको अपनी जान से भी अज़ीज़ है ॥ प्यार से सींचूँ उसे सच तह-ए-दिल से खाद दूँ , जानता हूँ ख़ूब वो कच्चा औ’’ पोला बीज है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 275 - तेरा हर इक.............

तेरा हर इक हुक़्म हँस-हँस 
कर बजा डालेंगे हम ॥ तेरे पीछे-पीछे आँखें 
बंद कर भागेंगे हम ॥ लीक पर ढर्रे पे तो 
सारा ज़माना चल रहा , कुछ नया कर के दिखा दे 
तो तुझे मानेंगे हम ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 274 - कब किसी क़िस्म..............

Image
कब किसी क़िस्म की तदबीर काम आती है ? नामो-शोहरत को तो तक़दीर काम आती है ॥ जब मुक़ाबिल हों तोपें बेहतरीन बंदूकें , तब गुलेलें न तो शमशीर काम आती है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 273 - बहुत हल्का मगर............

बहुत हल्का 
मगर भारी लगे है ॥ मुझे चिड़िया का 
पर भारी लगे है ॥ तुझे क्या सर उठाऊँ 
जबकि अपना , धरा काँधों पे 
सर भारी लगे है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 272 - रात दिन कर..............

Image
रात दिन कर तू वफ़ा सिर्फ़ वफ़ा की बातें ॥ मत डरा यार कर फ़रेबो दग़ा की बातें ॥ हो गई मुझसे जो गफ़्लत-ए-इश्क़ कर मुझसे , छोड़ ग़म दर्द की बस लुत्फ़ो-मज़ा की बातें ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 271 - सँकरी गली में..............

Image
सँकरी गली में लंबी-चौड़ी कार न चला ॥ चाकू से काट केक को तलवार न चला ॥ बादल हैं तेरे पास तो सूखे में फाड़ उन्हे , लबरेज़ कुओं नदियों में बौछार न चला ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति