97 : मुक्त-ग़ज़ल - मैं भी अजब............

मैं भी अजब तरह की बुराई में पड़ा हूँ ॥
दुश्मन से मोहब्बत की लड़ाई में पड़ा हूँ ॥
सब छू रहे हैं आस्मान की बुलंदियाँ ,
मैं अब भी तलहटी में तराई में पड़ा हूँ ॥
दिन रात बुरा कहता नहीं थकता जहाँ को ,
है कुछ वजह कि फिर भी ख़ुदाई में पड़ा हूँ ॥
मेरी ख़ता नहीं तेरे धक्कों के करम से ,
गड्ढों में पड़ा हूँ कभी खाई में पड़ा हूँ ॥
लू न लगे इस वास्ते चादर की कमी से ,
मैं जेठ की दोपहर रज़ाई में पड़ा हूँ

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुतिकरण,आभार। मेरी १०० वीं पोस्ट पर आपको आमंत्रण हैं।

धन्यवाद ! राजेन्द्र कुमार जी !
अच्छी ग़ज़ल है.
धन्यवाद ! Shoonya Akankshi जी !

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