96 : मुक्त-ग़ज़ल - उसको फँसा के..............

उसको फँसा के ख़ुद को तुमने छुड़ा लिया है ॥
अच्छा किया है तुमने जो भी बुरा किया है ॥
कुछ बात तो है वरना यूँ ही नहीं शहर का ,
हर शख़्स आप ही पर उँगली उठा रहा है ॥
मजदूर के पसीने की खूँ की क्यों हो क़ीमत ,
वो ख़ुद ही मानता है पानी बहा रहा है ॥
पुरनम नहीं हैं आँखें पर ग़मज़दा हैं दोनों ,
इक अश्क़ पी गया है इक अश्क़ ढा चुका है ॥
मंजिल न थी ये मेरी न मैं हूँ भी इसके क़ाबिल ,
ये मुक़ाम मैंने अपनी क़िस्मत से पा लिया है ॥
सब जानते हैं अच्छा क्या और बुरा क्या है ,
करते हैं सब बुरा तब जब दिखता फ़ायदा है ॥
शहरों में ही नहीं है माहौल शोरगुल का ,
गाँवों में भी तो हल्ला-गुल्ला मचा हुआ है ॥
राहों के धुप अँधेरों और तेज़तर हवा में ,
टिकती नहीं मशालें ये चिराग़ चीज़ क्या है ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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