95 : ग़ज़ल - मुक्त-पक्की कसौटियों पे......


पक्की कसौटियों पे न कस कर के देखना ॥
हमको परखना हो तो हँस हँस कर के देखना ॥
बचपन से शब-ओ-रोज़ जहर पीते आए हैं ,
ना एतबार आए तो डस कर के देखना ॥
न तू है अलादीन न इसमें है कोई जिन्न ,
नाहक है इस चराग़ को घस कर के देखना ॥
सूरज के उजालों में तो चंदा भी बुझा है ,
जुगनूँ की चकाचौंध तमस कर के देखना ॥
रहते हैं चुप पर आता है हमको भी बोलना ,
चाहो मुबाहसा-ओ-बहस कर के देखना ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Anita Rathi said…
Waah bahot khoob ....
कवि महेश सोनी said…
वाह बहुत ही शानदार ग़ज़ल..
बहुत बहुत धन्यवाद ! कवि महेश सोनी जी !

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