94 : मुक्त-ग़ज़ल - जब रहता हूँ...........


जब रहता हूँ फुर्सत या बेकार मैं ॥
करता हूँ तब कविताएँ तैयार मैं ॥
जब तक व्यस्त रहूँ मैं स्वस्थ मस्त रहता ,
फुर्सत पाते ही पड़ता बीमार मैं ॥
सपनों में उसके ही डूबा रहता हूँ ,
जिससे करता हूँ इक तरफा प्यार मैं ॥
बूंद न दूँ तालाब नदी को कूप को मैं ,
रेगिस्तानों में करता बौछार मैं ॥
घोर निराशा और हताशा में भी नहीं ,
कट मरने का करता सोच विचार मैं ॥
भीतर से पूरा शहरी हूँ मत मानो ,
यों ऊपर से दिखता ठेठ गँवार मैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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