93 : मुक्त-ग़ज़ल - कुछ भी तो..............


कुछ भी यहाँ पे तो नहीं नया दिखाई दे ॥
जो था यहाँ पे वो भी तो गया दिखाई दे ॥
माहौल हर तरफ़ है अफ़रा तफ़री का क़ाबिज़ ,
था जो टहल रहा वो भागता दिखाई दे ॥
बस्ती में डाकुओं को लुटेरों की  है हैरत ,
हर कोई आज भीख माँगता दिखाई दे ॥
उस नाजनीं का मुझको ग़रज़ से रिझाने की  ,
अब भी दुपट्टा गिरता सरकता दिखाई दे ॥
देता था जो वतन पे अपनी जान को कभी ,
शादी के बाद मौत से बचता दिखाई दे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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