*मुक्त-मुक्तक : 249 - मैंने नापा है...........


मैंने नापा है निगाहों में 
उसकी अपना क़द ॥
एक बिरवे से हो चुका वो 
ताड़ सा बरगद ॥
वो तो कब से मुझे
 मंजिल बनाए बैठा है ,
मुझको भी चाहिए अब 
उसको बना लूँ मक़सद ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Kavita Rawat said…
बहुत बढ़िया!

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