*मुक्त-मुक्तक 247 : पीतल के ही..............



पीतल के ही मिलते हैं बमुश्किल खरीददार ॥
इस शह्र में सोने की  मत लगा दुकान यार ॥
असली का तो अब जैसे रहा ही नहीं धंधा ,
नकली का फूल फल रहा हर जगह कारोबार ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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