*मुक्त-मुक्तक : 242 - खूब उथले हैं...........

खूब उथले हैं खूब गहरों के ॥
दिल हैं काले सभी सुनहरों के ॥
नाक है सूँड जैसी नकटों की ,
कान हाथी से यहाँ बहरों के ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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