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Showing posts from June, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 258 - ये उसी की रज़ा.............

ये उसी की रज़ा थी 
इतना क़ामयाब हुआ ॥ सब उसी की दुआ से 
मुझको दस्तयाब हुआ ॥ क्यों मुनादी न करूँ 
जबकि कम ही कोशिश में , जिसकी उम्मीद न थी 
सच वो मेरा ख़्वाब हुआ ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 257 - अतिशय विनम्र..............

अतिशय विनम्र था तनिक 
अशिष्ट हो गया ॥ पाकर के उनका प्रेम 
बहुत धृष्ट हो गया ॥ मित्रों में मेरी पूछ-परख 
पहले नहीं थी , अब शत्रुओं में भी मैं 
अति-विशिष्ट हो गया ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 256 - बात सारी दिल.............

बात सारी दिल की दिल में 
रख न बाहिर कर ॥ दोस्तों में भी कमी 
अपनी न जाहिर कर ॥ नीम रख दिल में मगर 
होठों पे रसगुल्ले , काम तो कर बात में भी
 ख़ुद को माहिर कर ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 255 - तलाशे वफ़ा में.................

तलाशे वफ़ा में जो 
हम घर से निकले ॥ हवेली महल झोपड़ी 
देखे किल्ले ॥ वफ़ा आश्नाई में 
इंसाँ से ज़्यादा , लगे आगे सच सारे 
कुत्तों के पिल्ले ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 254 - उसमें भरपूर.............

उसमें भरपूर जवानी में भी 
ग़ज़ब बचपन ॥ बाद शादी के भी पैवस्त 
धुर कुंवारापन ॥ उसकी चख़चख़ ग़ज़ल है 
चीख़ कुहुक कोयल की , बाद सालों के भी 
लगती है अभी की दुल्हन ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 253 - अरमान धराशायी..........

अरमान धराशायी 
हो जाएँ चाहे सारे ॥ मझधार निगल जाये
 नैया सहित किनारे ॥ फंदा गले में अपने 
हाथों से न डालूँगा , तब तक जिऊंगा जब तक
 ख़ुद मौत आ न मारे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

97 : ग़ज़ल - मैं भी अजब............

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मैं भी अजब तरह की बुराई में पड़ा हूँ  ।। दुश्मन से प्यार वाली लड़ाई में पड़ा हूँ  ।।1।। छूते बुलंदियों को उधर अर्श की सब ही , मैं अब भी तलहटी में , तराई में पड़ा हूँ  ।।2।। दिन-रात मैं जहाँ को बुरा कहता न थकता , है वज़्ह कोई यों न ख़ुदाई में पड़ा हूँ  ।।3।। मेरी ख़ता नहीं तेरे धक्कों के करम से , गड्ढों में मैं कभी ; कभी खाई में पड़ा हूँ  ।।4।। खाई है सर्दियों में क़सम से वो लू मैंने , मौसम में गर्मियों के रजाई में पड़ा हूँ  ।।5।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

96 : ग़ज़ल - उसको फँसा के

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उसको फँसा के ख़ुद को , तुमने लिया छुड़ा है ।। अच्छा किया है तुमने , जो भी किया बुरा है ।।1।। कुछ बात तो है वर्ना यूँ ही न शह्र का हर- इक शख़्स आप ही पर उँगली उठा रहा है ।।2।। मज़दूर के पसीने की खूँ की क्यों हो क़ीमत , वो ख़ुद ही मानता , वो पानी बहा रहा है ।।3।। पुरनम नहीं हैं आँखें , पर ग़मज़दा हैं दोनों , इक अश्क़ पी गया है , इक अश्क़ ढा चुका है ।।4।। मंजिल न थी मेरी ये , क़ाबिल भी मैं न इसके , ये तो मुक़ाम मैंने , क़िस्मत से पा लिया है ।।5।। सब जानते हैं अच्छा , क्या और क्या बुरा है , करते हैं सब बुरा तब , जब दिखता फ़ायदा है ।।6।। शहरों में ही नहीं बस , माहौल शोरगुल का , गाँवों में भी तो हल्ला-गुल्ला मचा हुआ है ।।7।। राहों के धुप अँधेरों , और तेज़तर हवा में , टिकती नहीं मशालें , तो फिर चिराग़ क्या है ?8।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 252 - सब हुए अत्याधुनिक.......

सब हुए अत्याधुनिक तू 
अब भी दकियानूस क्यों ? सबकी चालें हिरणो चीती 
तेरी अब भी मूस क्यों ? न सही अंदर से ऊपर 
से तो दिख शहरी यहाँ , सब हैं अप-टू-डेट इक 
तू ही मिसाले हूश क्यों ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 251 - क्यों दूर की.............

क्यों दूर की बुलंदी
दिखती खाई पास से ॥ क्यों क़हक़हों से बाँस 
सुबकते हैं घास से ॥ क्या यक-ब-यक हुआ कि
 तमन्नाई खुशी के , मिलते ही खुशी हो रहे 
उदास उदास से ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 250 - सीधी नहीं.................

सीधी नहीं मुझे प्रायः 
विपरीत दिशा भाये ॥ मैं चमगादड़ नहीं किन्तु सच 
अमा निशा भाये ॥ क्यों संतुष्ट तृप्त अपने 
परिवेश परिस्थिति से ? मुझको कदाचित नीर मध्य 
मृगमार तृषा भाये ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

95 : ग़ज़ल - हमको परखना ही हो

हमको परखना ही हो तो हँसकर के देखना ।। पक्की कसौटियों पे न कसकर के देखना ।।1।। आए हैं शब-ओ-रोज़ ही हम ज़ह्र फाँकते , आए न एतबार तो डसकर के देखना ।।2।। ना तू ही जिन्न और न अलादीन मैं कोई , नाहक है फिर चिराग़ को घसकर के देखना ।।3।। सूरज की रोशनी में तो चंदा भी है बुझा , जुगनूँ की चौंध दिन में तमस कर के देखना ।।4।। रहते हैं चुप पर आता है हमको भी बोलना , चाहो मुबाहसा-ओ-बहस कर के देखना ।।5।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 249 - मैंने नापा है...........

मैंने नापा है निगाहों में 
उसकी अपना क़द ॥ एक बिरवे से हो चुका वो 
ताड़ सा बरगद ॥ वो तो कब से मुझे
 मंजिल बनाए बैठा है , मुझको भी चाहिए अब 
उसको बना लूँ मक़सद ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 248 - बात बात पर रो............

बात बात पर रो पड़ना 
मेरा किरदार नहीं ॥ जिस्म भले कमजोर रूह 
हरगिज़ बीमार नहीं ॥ बचपन से ही सिर्फ चने 
खाए हैं लोहे के , नर्म मुलायम कभी रहा 
अपना आहार नहीं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

94 : ग़ज़ल - जब रहता हूँ मैं फ़ुर्सत

जब रहता हूँ मैं फ़ुर्सत या फिर बेकार ॥ तब करता हूँ कविताएँ अपनी तैयार ॥ रहता हूँ मस्रूफ़ तो रहती सेहत ठीक , फुर्सत पाते ही पड़ जाता हूँ बीमार ॥ ख़्वाबों में उसके डूबा रहता हर आन , जिससे करता हूँ इक तरफ़ा सच्चा प्यार ॥ तालाबों, नदियों , कूपों को क्यों दूँ बूँद , रेगिस्तानों में करता हूँ मैं बौछार ॥ नाउम्मीदी कितनी हो , कितना हो यास , मरने का हरगिज़ ना करता सोच-विचार ॥ भीतर से हूँ पूरा शहरी तू मत मान , बस ऊपर से ही दिखता हूँ ठेठ गँवार ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक 247 : पीतल के ही..............

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पीतल के ही मिलते हैं बमुश्किल खरीददार ॥ इस शह्र में सोने की  मत लगा दुकान यार ॥ असली का तो अब जैसे रहा ही नहीं धंधा , नकली का फूल फल रहा हर जगह कारोबार ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 246 - विष्णु न होकर............

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विष्णु न होकर लक्ष्मी की अभिलाषा अनुचित है ।   राम हो तो सीता का मिलना यत्र सुनिश्चित है – तत्र सभी अंधों के मन में पलती मात्र बटेर , शूर्पनखाओं को केवल लक्ष्मण ही इच्छित है !  -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 245 - चीख चिल्लाहट है............

चीख चिल्लाहट है कर्कश कान फोड़ू शोर है ॥ इस शहर में एक भागम भाग चारों ओर है ॥ सुख की सारी वस्तुएँ घर घर सहज उपलब्ध हैं , किन्तु जिसको देखिये चिंता में रत घनघोर है ॥ डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 244 - अंधों को है...........

अंधों को है गुलजार के 
दीदार का हुकुम ॥ गूँगों के लिए भौंरों सी 
गुंजार का हुकुम ॥ ये उल्टे हुक्मराँ जो 
ठग लुटेरे न्योतते , देते हैं निगेहबाँ को 
तड़ीपार का हुकुम ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 243 - जिसे मिलना न था.......

जिसे मिलना न था इक बार 
बारंबार पाता है ॥ जो फूटी आँख न भाए 
मेरा दीदार पाता है ॥ करिश्मा उसकी क़िस्मत का
 मेरी तक़्दीर का धोखा , वो मेरा क़ाबिले नफ़रत 
मुझी से प्यार पाता है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 242 - खूब उथले हैं...........

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खूब उथले हैं खूब गहरों के ॥ दिल हैं काले सभी सुनहरों के ॥ नाक है सूँड जैसी नकटों की , कान हाथी से यहाँ बहरों के ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 241 - कोई आशा की...........

कोई आशा की किरण
 सम्मुख न हो ॥ दुःख भरा हो उसमें किंचित 
सुख न हो ॥ कितना भी हो कष्टप्रद जीवन.... 
युवा , आत्महत्या को कभी 
उन्मुख न हो ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

93 : ग़ज़ल - कोई न काम-धाम

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कोई न काम-धाम जो करता दिखाई दे ।।
हर शख़्स सिर्फ़ ख़्वाब ही तकता दिखाई दे ।।1।। क़ाबिज़ है अफ़रा-तफ़री का माहौल हर तरफ़ , जो भी टहल रहा था वो भगता दिखाई दे ।।2।। हैराँ हूँ डाकुओं के लुटेरों के गाँव में , हर कोई आज भीख ही मँगता दिखाई दे ।।3।। उस नाजनीं का मुझकोरिझाने के वास्ते , अब भी दुपट्टा गिरता-सरकता दिखाई दे ।।4।। देता था जो वतन पे कभी अपनी जान को, शादी के बाद मौत से बचता दिखाई दे ।।5।।
हर कोई है फिराक में कालिख को पोतने ,
कोई कहीं न प्यार को रँगता दिखाई दे ।।6।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 240 - पढ़ता नहीं कोई..........

पढ़ता नहीं कोई तो भला 
क्यों लिखे कोई ? अंधे के लिए बन सँवर के
 क्यों रहे कोई ? होता ज़रूर होगा कुछ तो 
फ़ायदा वरना , सुनता न कोई फिर भी अपनी 
क्यों कहे कोई ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 239 - पेड़ पे लटका.............

पेड़ पे लटका आम 
लगता टपका-टपका सा ॥ आँख फाड़े हुए 
जागूँ मैं झपका-झपका सा ॥ हर्ष-उत्साह से 
अनभिज्ञ निरंतर निश्चित , मृत्यु की ओर 
बढ़ रहा हूँ लपका-लपका सा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 238 - बर्फ़ हैं लेकिन..........

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बर्फ़ हैं लेकिन हमेशा दिल जला देते हैं वो ॥ पैर बिन ही पुरग़ज़ब ठोकर लगा देते हैं वो ॥ उनका हर इक काम हैरतनाक अजीबोग़रीब है , अपनी मासूमी के धोखे से दग़ा देते हैं वो ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 237 - इससे बढ़कर के........

इससे बढ़कर के क्या 
तक़दीर का मज़ाक होगा ॥ आग से बचके वो 
पानी से जल के राख होगा ॥ उसको भरते रहे 
पानी से लबालब हर दिन , क्या पता था कि वो 
अंदर शकर या खाक होगा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति