90 - मुक्त-ग़ज़ल - शिकंजे यूं कसे..................


शिकंजे यूँ कसे थे मुझपे तिल भर हिल नहीं पाया ॥
हिला तो यों फटा ताउम्र कोई सिल नहीं पाया ॥
मुझे फेंका गया था सख़्त बंजर सी ज़मीनों पर ,
मैं फ़िर भी ऊग बैठा हूँ अगरचे खिल नहीं पाया ॥
उठाये अपने सर हाथी पहाड़ों से मैं फिरता हूँ ,
तुम्हारे हल्केपन का पंख सा चूज़ा न झिल पाया ॥
न हो हैरतज़दा चमड़ी मेरी है खाल गैंडे की ,
वगरना कौन मीलों तक घिसट कर छिल नहीं पाया ॥
मेरे हाथों में वो सब है न हूँ जिसका तमन्नाई ,
हुआ हूँ जबसे हसरत है वो सामाँ मिल नहीं पाया ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Ghanshyam kumar said…
वाह... बहुत सुन्दर...
धन्यवाद ! Ghanshyam kumar जी !
Dr. Dinesh Sharma said…
लफ्ज दर लफ्ज उतरते गये जेहन मे
नसीब के नश्तर
के सरकने के साथ साथ

नायाब Dr. Saab.
धन्यवाद ! Dr. Dinesh Sharma जी !
Shiv Raj Sharma said…
सुन्दर है सर
धन्यवाद ! Shiv Raj Sharma जी !

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