*मुक्त-मुक्तक : 226 - क़िस्म क़िस्म की..........


क़िस्म क़िस्म की नई नई वह 
साजिश रोज़ रचे ॥
मुझ पर क़ातिल घात लगाए
 कैसे जान बचे ॥
वो शमशीर कोई सुल्तानी 
मैं कछुए सी ढाल ,
बकरे की माँ कब तक ख़ैर 
मनाती फिरे नचे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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